बलबन 1266 ई.-1206 ई.


  • इसका वास्तविक नाम बहाउदीबहाउद्दीन था और उलूग खाँ इसकी उपाधि थी जो इसे वजीर के पद पर रहते हुए इल्तुतमिश के पोते नासिरुद्दीन महमूद ने प्रदान की थी।

  •  नासिरुद्दीन महमूद जिसका शासन लगभग 1246 से 1266 ई. तक रहा।

  •  इसने 20 वर्ष तक शासन तो किया पर शासन की समस्त बागडोर बलबन के हाथ में रही और उसकी मौत के बाद बलबन ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। 

  • बलबन ने 1266 से 1286 तक शासन किया।

  • कहते हैं कि व्यक्ति अपने अनुभवों से अधिक सीखता है और बलबन के पास अनुभव की कमी नहीं थी। 

  • बलबन इल्तुतमिश के 40 सरदारों के संगठन चहलगानी का सदस्य रह चुका था और वो इसकी शक्ति को भली -भांति जानता था।इसलिए उसने इस संगठन को ही समाप्त कर दिया। 

  • इल्तुतमिश ने मंगोलो के आक्रमण से स्वयं को बचा लिया था, लेकिन मंगोलो के आक्रमण का डर हमेशा बना रहता था।

  •  इसके लिए बलबन ने सीमावर्ती क्षेत्रों में दुर्गों का निर्माण किया और सैन्य विभाग जिसे "दीवाने आरिज "कहा जाता था ,को पुनर्गठित किया और शक्तिशाली बनाया ताकि वह मंगोलो का सामना कर सके।

  • बलबन ने सुल्तान को सर्वोच्च साबित करने के लिए सिजदा और पाबोस की प्रथा को दरबार में शुरू किया जिसका पालन उसके दरबार के लोगों को अनिवार्य रूप से करना होता था। 

  • बलबन ने दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत बनाया।

  •  बलबन ने सुल्तान बनने के बाद अपने शत्रुओं के प्रति लौह और रक्त की नीति अपनाई थी, जिसमें पुरुषों को मार दिया जाता था और बच्चों व महिलाओं को गुलाम बनाया जाता था। 

  • इस तरह वो अपने विरोधियों को नष्ट करने में विश्वास रखता था। 

  • बलबन का राजत्व सिद्धांत प्रसिद्ध रहा है। उसकी मान्यता थी कि राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है जो साधारण जनता से अलग व्यक्तित्व है और वह ईश्वर द्वारा प्रदत गुणों से युक्त है जो उसे शासन करने की शक्ति प्रदान करता है।

  •  बलबन मुसलमान विद्वानों का आदर तो करता था लेकिन राजकीय कार्यो में उनको दखल नहीं देने देता था।

  •  बलबन तुर्क अमीरों से और उनकी विद्रोह की नीति से परिचित था, इसलिए उसने दरबार में कठोर अनुशासन बनाए रखा जिसका पालन करना सभी के लिए अनिवार्य था और नहीं करने पर अत्यंत कठोर दंड व्यवस्था का सामना करना पड़ता था।

  • बलबन ने अपनी कठोर दंड व्यवस्था के कारण दरबार में अनुशासन बनाए रखा और चोर डाकुओं का दमन किया।

  •  बलबन ने अपने शासनकाल में राजपूत जमीदारों के शासन विरोधी विद्रोह का दमन किया। 

  • बलबन पहला भारतीय मुस्लिम शासक था जिसने स्वयं को जिल्ले इलाही अर्थात ईश्वर की छाया कहा था और उसने यह उपाधि सिक्कों पर भी अंकित करवाई थी।

  •  1286 ई.में बलबन की मौत के बाद अमीरों के दलीय संघर्ष ने खूनी रूप ले लिया और इस संघर्ष ने गुलाम वंश का अंत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

  • बलबन ने अपने पोते केखुशरव को अपना उत्तराधिकारी बनाया, लेकिन उसके सरदारों ने षड्यंत्र रच कर उस के दूसरे बेटे बुगराखाँ के बेटे केकुबाद को सुल्तान बनाया जो राज्य रोहन के समय सत्रह- अठारह वर्ष का था, लेकिन वह नाम मात्र का ही शासक रहा और उसे विलासी बना दिया गया, जिससे वह लकवे से पीड़ित हो गया। 

  • ऐसे में उसके तीन वर्ष के बेटे क्यूमर्स जो बलबन का पड़पोता था, उसे गद्दी पर बैठाया गया और उसे सुल्तान बना दिया गया। 

  • जलालुद्दीन खिलजी को 3 वर्ष के सुल्तान क्यूमर्स का संरक्षक बनाया गया था और उसने 3 महीने बाद ही सुल्तान और उसके पिता की हत्या कर दी।

  •  इस तरह जलालुद्दीन ने क्यूमर्स की हत्या करके स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया और गुलाम वंश का अंत कर दिया और इसके साथ ही दिल्ली में एक नये राजवंश की शुरुआत हुई जिसे खिलजी वंश के नाम से जाना गया।